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मेरी गली होगी

                
                                                         
                            एक आह सी निकली होगी
                                                                 
                            
जब नंगे पाँव चली होगी

बिछा देता ख़ुद को उसकी राहों में
भले ज़माने में खलबली होगी

याद अाता होगा समंदर में उतरता सूरज
जब शाम ढली होगी

टपकते होंगे आँसू शबनम से
जब मेरी याद में रोती पगली होगी

मुस्कुराती होगी याद कर पुरानी बातें
जब तवे पर रोटी जली होगी

"अजीत " अाता होगा ज़िक्र इस फ़क़ीर का
जब गुज़री होगी, मेरी गली होगी

अजीत यादव

 हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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7 वर्ष पहले

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