आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

मज़हबी इश्क़

                
                                                         
                            बह रहा है ख़ून मज़हबी उन्माद में
                                                                 
                            
मेरा ख़ुदा, तेरा ख़ुदा जाहिल -ए-ईजाद में

ख़ुदा ने सौगात में दुनिया अता किया
मज़हब का क्या करेगा मरने के बाद में

इश्क़ भी रूसवा हुआ मज़हब के नाम पर
लुट रही है आबरू लाखों तादाद में

मासूम जानता नहीं कि सामने है भेड़िया
तालीम मज़हबी है मोहब्बत के स्वाद में

मोहब्बत अगर होती तो मज़हब नहीं होता
हासिल नहीं, मक़सद नहीं,फिर किस मुराद में

उम्र कट गई अजीत ज़िदगी को जानने में
इंसान जी रहा है मज़हब के शाद में

अजीत यादव

- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
7 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर