आसमां और ज़मीन
के बीच मेरा ख़्वाबों
का रंगमंच
सामने एक एहसासों का पेड़
दूर से शाम को कलरव
करते हुए लौटते पंछियों
का झुंड
पार्श्व खिड़की से
दिखता क्षितिज से
आता हुआ रास्ता
और मै मंच पर एकल
बैठा हुआ कल्पनाशील
अभिनेता... शांतचित्त
अभिनय से परे
मस्तिष्क में उभरती
ठरकी निर्देशक की आंखें
अपनी महिला पात्र को
दृश्य समझाते हुए...
जिसकी आंखों मे दृश्य के
भाव से ज़्यादा प्रबल
हवस के भाव...
हां अजीत.. अब मेरा यही है
रंगमंच... यथार्थ का नहीं
ख़्वाबों का.....
अजीत यादव
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