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दृष्टिकोण

                
                                                         
                            चलो नदी के
                                                                 
                            
छोर पर....
जहाँ पर रेत
पसरी हो....
उँगलियों के
पोर से...
कुआँ कोई
खोद लें...
अगर पानी
निकल गया
तो भाग्य है या कर्म है
तिश्नगी भी बुझ गई
कामयाब हो, पुरस्कार है
अगर प्रयास विफल हुआ
मन तुम्हारा विकल हुआ
तिश्नगी भी बढ़ गई
तो भाग्य है या कर्म है
नाकाम हो, तिरस्कार है
सवाल हालात का है
दृष्टिकोण का
या दर्शन का....

अजीत यादव

 हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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7 वर्ष पहले

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