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चाहने लगा हूं

                
                                                         
                            हद की हद पार करके, चाहने लगा हूं।
                                                                 
                            
तस्वीर तेरी पानी में, उतारने लगा हूं।।

तू हो ना जाए ओझल, आंखो से जानेजां ।
इस लिए अब नींद भी त्यागने लगा हूं।।

अब रहा ना होश,मुझे खुद को संभालने का।
रात~दिन तुझे इस कदर संभालने लगा हूं।।

जमाना कर भी दे रुसवा मुझे दुनिया से "बेखबर"।
अब मैं तुझे ही अपनी "दुनिया मानने लगा" हूं।।


- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

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7 वर्ष पहले

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