जागती हैं आँखें उम्मीदों की आस लेकर
आम आदमी हूँ जीता हूँ कुछ खास लेकर
गुलामी से अच्छा है बेघर होना
खुश हूँ धरती, खुला आकाश लेकर
देखता हूँ ख्वाब दुनिया मेरी मुट्ठी में
क्या फायदा सपने उदास लेकर
अमीरों का साथ,कुत्तों की सवारी
भटकता है कोई अपनों की लाश लेकर
मंजिल पे पहुंचुूगा एक न एक दिन
चल पड़ा था सफर में यही एहसास लेकर
अजीत छिपा लो तुम भी अपने दाग
चेहरे का,उजला लिबास लेकर
अजीत यादव
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें
कमेंट
कमेंट X