जिसने सचमुच ख़ुदा को जान लिया,
उसने अपने भीतर का इंसान पहचान लिया।
जिसने अपने मन के पर्दे हटा लिए,
उसने सत्य के रास्ते अपना लिए।
ख़ुदा को खोजने निकला था इंसान,
मंदिरों, मस्जिदों में भटका सुबह-शाम।
कभी माँगी मन्नत, कभी की इबादत,
फिर भी अधूरी रही मन की चाहत।
वह बाहर खोजता रहा उजियारा,
भीतर बैठा था अँधियारा सारा।
जिसे पाने को दुनिया में भटकता रहा,
वह ख़ुद उसके भीतर ही छिपा रहा।
जो ख़ुद को जानने की हिम्मत करता है,
वह अपने ही भ्रमों से लड़ता है।
जो अपने मन का सच पहचान लेता है,
वह झूठे अहंकार को त्याग देता है।
न वह ऊँचा है, न कोई नीचा,
न कोई पराया, न कोई अनदेखा।
जब अपने भीतर का भेद मिट जाता है,
हर चेहरा अपना-सा नज़र आता है।
न धन से मिलता, न मान से मिलता,
न केवल शब्दों के ज्ञान से मिलता।
सत्य न दिखावे, न शोर में रहता है,
वह शांत हृदय के भीतर बहता है।
जो अपनी इच्छाओं को समझने लगता है,
वह अपने बंधनों को तोड़ने लगता है।
जो अपने दुख का कारण जान जाता है,
वह दूसरों के दुख को भी पहचान जाता है।
ख़ुदा को जानना केवल दावा नहीं,
यह शब्दों का खेल, कोई दिखावा नहीं।
यह ख़ुद को जानने की गहरी उड़ान है,
अपने ही भीतर उतरने का नाम है।
जब ‘मैं’ का अहंकार पिघल जाता है,
तब प्रेम का झरना भीतर बह जाता है।
जो ख़ुद को पहचानकर सत्य से जुड़ गया,
समझो, वह ख़ुदा की पहचान के निकट पहुँच गया।
— अजयकुमार
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