डिग्री: एक नई हुंकार
कभी बैठी मैं रसोई में याद करती हूँ वो दिन,
कितनी मेहनत से पाई थीं ये डिग्रियाँ।
हर मौसम, हर मुश्किल,
घर-परिवार और समाज से लड़कर,
बड़े लम्बे समय में कमाईं ये डिग्रियाँ।
कभी घनघोर बारिश में जाकर,
तो कभी भयंकर तूफानों में।
ठंडी के कोहरे की सुबह में,
गर्मी की तपती धूप में।
कभी त्योहारों के दिनों में,
तो कभी शादियों के माहौल में।
हर दिन कठिन परिश्रम करके,
दीं मैंने अनेक परीक्षाएँ,
तब जाकर कहीं मैंने पाईं ये डिग्रियाँ।
दोस्तों की शादी छोड़कर,
घर की पाई-पाई जोड़कर।
गंभीर बीमारी होने पर भी,
बढ़ता रहा पाँव इस ओर।
करती रही सदा संघर्ष,
चाहे हो रात या भोर,
इन सब रास्तों से गुज़रकर,
पाईं मैंने ये डिग्रियाँ।
जब हो गई शादी मेरी, तब भी नहीं छोड़ी मैंने पढ़ाई,
हर ताने, हर मुश्किल को सहकर, लड़ी मैंने अपनी लड़ाई।
घर-परिवार की ज़िम्मेदारियों से ऊपर उठकर,
अपनी छोटी बच्ची को रोता हुआ घर पर छोड़कर।
रातों को जागकर, आँसुओं को पोंछकर,
तब कहीं जाकर पाया मैंने, ये अनमोल डिग्रियाँ!
अब बैठती हूँ मैं सोचकर, कहाँ करूँ इसका प्रयोग,
बच्चे भी हो गए दो-तीन, अब है परिवार का बड़ा बोझ।
शरीर भी मेरा अब पहले जैसा मूल्यवान न रहा,
मेरा यह संघर्ष अब मेरे अभिमान का न रहा।
फिर बैठी रसोई में देखा, भोजन है मेरा जल रहा,
दौड़ी अचानक उस ओर, हृदय मेरा अब रो रहा।
कहते हैं सब लोग घर के, खाना मेरा बनाया बेस्वाद रहता है,
मैं लाख कोशिश करूँ, फिर भी कमियों का ही हिसाब रहता है।
फिर सोचती हूँ, जब रसोई में सह रही हूँ रोज़ ये इम्तिहान,
तो क्यों न करूँ अपनी शिक्षा के लिए भी एक नया उत्थान!
सहसा अचानक यह बात समझ आई,
मैं पूछती हूँ खुद से, क्यों रोकी मैंने अपनी पढ़ाई?
अब थम चुका है तूफ़ान, बस एक आख़िरी जंग बाकी है,
झुकेंगी मुश्किलें मेरे आगे, क्योंकि मुझमें हौसला अभी बाकी है!
लड़कर जीतूँगी हर बाज़ी, पहुँचूँगी ज़रूर उस मुक़ाम पर,
जिसके लिए कड़ी मेहनत से कमाई थीं ये डिग्रियाँ!
-आकृति
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