तुम रहती हो उस शहर में,
जहाँ यादें भी इबादत बन जाती हैं,
इलाहाबाद की सुबहों में जैसे गंगा चुपके से मुस्काती है।
मैं दूर सही, पर दिल हर रोज़ वहीं चला जाता है,
जहाँ संगम की लहरों में कोई सपना बहता नज़र आता है।
एक सपना है मेरा, थोड़ा मासूम, थोड़ा अनजाना,
बस तुम्हारा हाथ थामे चलना, शाम ढले वो पुराना ठिकाना।
इलाहाबाद की गलियों में यूँ खो जाना,
तुम हँस दो हल्का सा… और मेरा दिल वहीं रह जाना।
संगम किनारे बैठकर चुपचाप पानी को निहारेंगे,
तीन नदियों के मिलन में शायद अपने एहसास उतारेंगे।
गंगा की ठंडी हवा जब तुम्हारे बालों को छू जाएगी,
मेरी हर अधूरी बात शायद खुद-ब-खुद कह जाएगी।
बड़े हनुमान मंदिर में सिर झुकाकर बस इतनी दुआ माँगूंगा,
हर जन्म में तेरी दोस्ती मिले, यही वादा निभाऊँगा।
वो लेटे हुए बजरंगबली जैसे सब सुन लेते हैं,
शायद मेरे दिल के राज भी धीरे-धीरे चुन लेते हैं।
खुसरो बाग़ की राहों में कुछ पल चुप रहेंगे,
सिविल लाइन्स की रोशनी में हँसते हुए बहकेंगे।
पुरानी किताबों जैसी लगेगी यूनिवर्सिटी की हवा,
और तुम संग हो तो हर मोड़ लगेगा जैसे खुदा की दुआ।
तुम मेरी सबसे प्यारी दोस्त हो, ये बात अलग है,
पर दिल में कहीं एक मीठा-सा जज़्बात अलग है।
ना जल्दबाज़ी, ना कोई शोर, ना कोई दावा,
बस तुम्हारा हाथ पकड़ कर इलाहाबाद घूमने का सपना आधा-अधूरा सा प्यारा।
अगर कभी सच में वो शाम हमारी हो जाए,
संगम की लहरें गवाह हों, हवा मुस्कुराए,
तो मैं बस इतना कहूँ —
“इलाहाबाद खूबसूरत है… पर तुम साथ हो, तो और भी लग जाए।”
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