आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

कोई क्या रुलाएगा उस माँ को नवल बता!

                
                                                         
                            महँगाई ओ बेरोजगारी की मार है दोस्त!
                                                                 
                            
भूखा हो पेट, माँ उपवास समझ लेती है!

बेटा आया है फिर खाली हाथ बाजार से !
रखकर सिर पे हाथ अहसास समझ लेती है!

कोई सुने या नहीं सुने मेरे दुःख की कहानी!
माँ छोटी सी बात को उपन्यास समझ लेती है!

कोई क्या रुलाएगा उस माँ को नवल बता!
जो फाका कसी को अभ्यास समझ लेती है!

पल भर के लिए मैं घर से बाहर क्या गया!
वो छोटी सी यात्रा को वनवास समझ लेती है!
-नवल किशोर "नवल"
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर