ग़ज़ल: विमुख खुशियाँ
नाराज़ हमेशा खुशियाँ ही होती हैं,
ग़म के ज़रा भी नख़रे नहीं होते।
जो दर्द मिले चुपचाप सह लेते हैं हम,
हर ज़ख़्म के दुनिया में चर्चे नहीं होते।
कुछ ख़्वाब तो आँखों में ही दम तोड़ गए,
हर ख़्वाब मुकम्मल, सुनहरे नहीं होते।
जिसको भी समझ बैठे थे अपना हमसफ़र,
हर शख़्स के रिश्ते वो मेरे नहीं होते।
जब तक रहे रौशन घर अपना ख़ुशियों से,
कहने को सभी लोग पराए नहीं होते।
जब वक़्त ने बदली ज़रा करवट अपनी,
साये भी कभी साथ में ठहरे नहीं होते।
कल तक जो हमारा हाल पूछते थे,
आज उनके पास वक़्त के पहरे नहीं होते।
महफ़िल में हँसते हैं तो समझते हैं ख़ुश हम,
चेहरे के पीछे दर्द के चेहरे नहीं होते।
कुछ लोग बिछड़कर भी नहीं जाते दिल से,
कुछ पास रहकर भी हमारे नहीं होते।
हमने तो मोहब्बत में सब कुछ ही लुटा दिया,
हर दिल में मगर इश्क़ के डेरे नहीं होते।
तक़दीर से शिकवा भी करें तो करें कैसे,
हर मोड़ पे अपने ही बसेरे नहीं होते।
कुछ अश्क दुआ बनके उतर जाते हैं दिल में,
हर दर्द के मौसम भी अँधेरे नहीं होते।
जो हाथ पकड़ ले वो अपना है सच में,
सिर्फ़ बोलने वाले तो सहारे नहीं होते।
अब छोड़ दिया हमने गिला भी मुक़द्दर से,
हर फ़ैसले दिल के तो सुनहरे नहीं होते।
कनौजिया ये ज़िंदगी समझाती है धीरे
हर शख़्स यहाँ दिल के बसेरे नहीं होते,
नाराज़ हमेशा खुशियाँ ही होती हैं,
ग़म के ज़रा भी नख़रे नहीं होते।
-डी के कनौजिया
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