अधिकार किसने दिया
तुम कहते हो कि हमने नारी को अधिकार दिया,
ज़रा ठहरो पुरुष, इतना तो बतला दो।
जिसने तुम्हें जन्म दिया, जीवन का आधार दिया,
क्या उसने भी तुमसे अपने जीने का अधिकार लिया था।
जिसने अपनी कोख में
नौ महीने तुम्हारी साँसें सँभालीं,
जिसने भूखी रहकर तुम्हारी थाली सजाई,
जिसने अपनी नींद तुम्हारी पलकों पर रख दी,
जिसने अपने सपनों की चिता जलाकर
तुम्हारे भविष्य की लौ जलाई,
आज उसी के सामने खड़े होकर
तुम कहते हो कि तुमने उसे आज़ादी दी।
कैसा अभिमान है यह,
कैसा न्याय है तुम्हारा।
जिसकी ममता से तुम मनुष्य बने,
उसी के अस्तित्व पर तुमने
अपना अधिकार जताया।
कभी उस माँ से पूछना,
जिसने बेटी को जन्म देते ही
अपने ही घर में आँसू पिए थे।
कभी उस बेटी से पूछना,
जिसने खिलौनों की उम्र में
दहेज के भय को जीना सीखा था।
कभी उस पत्नी की आँखों में देखना,
जिसने हँसते हुए सब सह लिया,
मगर रात के अँधेरे में
तकिए से अपना दर्द कहा था।
कभी उस स्त्री से पूछना,
जिसकी डिग्रियाँ संदूक में बंद रहीं,
जिसकी इच्छाएँ रसोई के धुएँ में घुट गईं,
जिसकी प्रतिभा को परंपरा ने बाँध लिया,
और जिसके मौन को तुमने
उसकी सहमति समझ लिया।
फिर किस बात का गर्व है तुम्हें,
किस बात का सम्मान माँगते हो।
तुमने उसके पंख नहीं बनाए,
तुमने तो बस उसके आकाश पर
पहरे बिठाए थे।
सुनो पुरुष।
नारी तुम्हारी दया की याचक नहीं,
वह तुम्हारे अस्तित्व की जननी है।
वह तुम्हारे घर की शोभा भर नहीं,
वह अपने आप में एक पूरी दुनिया है।
उसके आँचल में ममता है,
तो उसकी आँखों में अग्नि भी है।
उसकी हथेलियों में सृजन है,
तो उसकी मुट्ठियों में क्रांति भी है।
वह चाहे घूँघट में रहे,
या खुले आकाश में साँस ले।
वह चाहे बुर्क़ा पहने,
या अपनी पसंद के वस्त्र चुने।
उसकी गरिमा का निर्णय
उसकी अपनी इच्छा करेगी,
कोई पंचायत, कोई परंपरा,
कोई सत्ता नहीं।
धर्म अगर करुणा सिखाता है,
तो स्त्री पर पहरा कैसा।
संस्कृति अगर सम्मान सिखाती है,
तो उसकी इच्छा पर पहरा कैसा।
नारी की स्वतंत्रता का अर्थ
किसी की संस्कृति मिटाना नहीं,
बल्कि उसकी अपनी पहचान को
सम्मान के साथ जीने देना है।
अधिकार दिए नहीं जाते,
अधिकार स्वीकार किए जाते हैं।
न्याय किसी की कृपा नहीं,
न्याय के सामने सब बराबर होते हैं।
तुम उसे देवी कहकर
मंदिरों में ऊँचा स्थान देते हो,
और घर की चौखट पर
उसकी आवाज़ नीची कर देते हो।
यह कैसी पूजा है,
जिसमें पत्थर की मूर्ति को फूल मिलते हैं,
मगर जीवित स्त्री को
अपने सपनों के लिए अनुमति माँगनी पड़ती है।
यह कैसी सभ्यता है,
जहाँ दुर्गा की जय बोली जाती है,
मगर बेटी के जन्म पर
घर की खुशियाँ बुझ जाती हैं।
अब बहुत हुआ।
उसके आँसुओं को कमजोरी मत समझो,
उसकी चुप्पी को स्वीकृति मत समझो।
जिस दिन उसके धैर्य का बाँध टूटेगा,
उस दिन तुम्हारे अहंकार के महल
रेत की तरह ढह जाएँगे।
वह उठेगी,
तो केवल अपने लिए नहीं,
हर उस बेटी के लिए उठेगी
जिसकी आवाज़ जन्म से पहले दबा दी गई।
हर उस माँ के लिए उठेगी
जिसकी ममता को कर्तव्य कहकर भुला दिया गया।
हर उस स्त्री के लिए उठेगी
जिसने अपना पूरा जीवन दूसरों के नाम किया,
पर अपने नाम से जीने का
एक दिन भी अवसर नहीं पाया।
और उस दिन
वह तुमसे अधिकार नहीं माँगेगी,
वह तुम्हें तुम्हारा कर्तव्य याद दिलाएगी।
क्योंकि अब वह जान चुकी है,
उसका जन्म किसी की अनुमति से नहीं हुआ,
उसका अस्तित्व किसी की कृपा पर नहीं टिका,
और उसकी स्वतंत्रता
किसी के हस्ताक्षर की मोहताज नहीं।
हे पुरुष,
यदि सचमुच नारी का सम्मान करना है,
तो उसके लिए आसमान मत बनो,
उसे अपना आसमान चुनने दो।
उसके रास्ते के रक्षक बनने से पहले
अपने भीतर के पहरेदार को हराओ।
उसे अधिकार देने का दावा छोड़ो,
और उसके अधिकारों का सम्मान करना सीखो।
याद रखना।
जिस समाज में नारी को
अपने ही जीवन का निर्णय लेने के लिए
दूसरों के सामने हाथ फैलाना पड़े,
वहाँ स्वतंत्रता केवल शब्द है,
न्याय केवल नारा है,
और सभ्यता का माथा
आज भी शर्म से झुका हुआ है।
नारी को अधिकार किसने दिया,
यह प्रश्न अब इतिहास से पूछो।
और यदि उत्तर न मिले,
तो अपने अहंकार से पूछना।
जिसे तुमने सदियों तक कमज़ोर समझा,
उसी के कंधों पर खड़े होकर
तुम इतने ऊँचे कैसे हो गए।
-डी. के. कनौजिया
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