अगर 80 के दशक में ही चले गए हो,
तो जाते-जाते एक काम करते जाना…
भाइयों का वो प्यार,
और संयुक्त परिवार की वो मिठास,
ज़रा अपने साथ फिर से लेते आना ।
लेते आना वो घर,
जहाँ दरवाज़े कम थे,
पर दिलों में दीवारें नहीं थीं।
लेते आना वो आँगन,
जहाँ एक चूल्हे की रोटी
पूरे परिवार का पेट भर देती थी,
और एक थाली में बैठकर खाना
किसी को छोटा-बड़ा नहीं करता था।
लेते आना वो भाई,
जो ख़ुद भूखा रहकर भी
छोटे भाई की थाली में
अपनी आख़िरी रोटी रख देता था।
लेते आना वो बहनें,
जो मायके से विदा होकर भी
भाई की कलाई का इंतज़ार करती थीं…
और वो भाई,
जो राखी बँधवाकर
ख़ुद को पूरी दुनिया से अमीर समझता था।
तब घर छोटे थे,
मगर रिश्ते बड़े थे…
पैसे कम थे,
मगर अपनापन बहुत था।
आज मकान बड़े हैं,
कमरे अलग हैं,
रसोई अलग है,
हिसाब अलग है…
बस पता नहीं क्यों,
दिलों के बीच का रास्ता भी
अलग हो गया है।
अब भाई के पास भाई का नंबर है,
लेकिन वक़्त नहीं…
बहन के पास राखी है,
लेकिन मिलने का बहाना नहीं…
माँ के पास इंतज़ार है,
लेकिन बच्चों के पास
घर लौटने का समय नहीं…
और पिता की कुर्सी आज भी खाली है,
बस कोई पूछने वाला नहीं- “पापा, खाना खा लिया?”
इसलिए…
अगर 80 के दशक में ही चले गए हो,
तो इस बार खाली हाथ मत लौटना।
थोड़ा-सा वो बचपन लेते आना,
थोड़ा-सा वो अपनापन,
थोड़ी-सी वो हँसी,
थोड़ा-सा वो भाईचारा…
और हाँ…
अगर हो सके,
तो वो संयुक्त परिवार भी लेते आना,
जिसमें लोग कम नहीं होते थे,
बस दिलों में जगह बहुत होती थी।
क्योंकि आज हमारे पास
सब कुछ है…
बस वो लोग नहीं हैं,
जिनके होने से
“घर” सच में घर लगता था।
- डी. के. कनौजिया
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