गलत किया था काम उसी का भुगत रहा परिणाम।
अब नहीं करेंगे गलती फिर से इसका बुरा अंजाम।।
आए हम जब कारागार में अकल ठिकाने आई।
समझ नहीं आया था तब जब समझाती थी माई।।
छूट गया घरवार हमारा और छूटी हैं संताने।
किए बहुत अपराध किंतु हम नहीं किसी की माने।।
अब मेरा मन मुझसे कहता मैं जाऊं तीरथ धाम।
मेरे नन्हें मुन्हें बच्चों की भी बांकी पड़ी पढ़ाई।
घर में कुंवारी बिटिया की अभी करनी पड़ी सगाई।
नहीं करेंगे लड़ाई-झगड़ा अब मेरे समझ में आया।
सोचे बिना कर दिया था परिणाम उसी का पाया।।
अब बारंबार करेंगे चिंतन करेंगे जब कोई काम।
जब से आए हम कारागार में घर की याद सताए।
प्रेम हमें परिवार का अपने यहां कैसे मिल पाए।।
पश्चाताप अब बहुत होता मुझे कोई रिहा करा लो।
बाबू जी से कहकर मेरी जमानत जल्द करा दो।
जैसे तैसे दिन कट जाता फिर नहीं कटती शाम।
-कुमार आदित्य यदुवंशी
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