चेहरे से आंसुओं को ज़रा साफ़ कर ले
आ ज़िंदगी बैठ ज़रा... तेरे शब्दों का हिसाब कर ले
सबका रचयिता तो वो विधाता है...
जिसने अपने कोमल हाथों से हम सबको काता है
रिश्ते-नाते, दुनियादारी सब 4 दिन का मेला है...
जिसमें जयसंहिता की भांति सबने षड्यंत्र खेला है ।
विडंबना तो अब सामने है...
जिसमें एक तरफ दिल, दूसरी ओर दिमाग के मुआयने हैं...
देखते हैं वक्त किस पर विजय को पाता है...
एक तरफ वाणी, दूसरी ओर शब्दों का कुछ और ही इरादा है...
तपिश बहुत है इन शब्दों के ज़ख्मों में...
ज़रा सा छिड़क कर इन्हें भी तेज़ाब कर ले
आ ज़िंदगी बैठ ज़रा... शब्दों का हिसाब कर ले
लफ़्ज़ कटार भी तो प्यार भी...
कहीं... मरहम भी तो तिरस्कार भी...
कहीं आशीर्वाद तो कहीं अभिशाप भी...
कहीं अश्रु तो कहीं हंसी की किलकार भी
कहीं परामर्श तो कहीं उच्च विचार भी...
ये सब शब्दों की ही माया है...
जिसने भारतवर्ष का महाभारत भी करवाया है...
मानुष तो एक पुतला है लफ़्ज़ों की इस दुनिया में...
तो जो भी सवाल है उसका जवाब कर ले
आ ज़िंदगी बैठ ज़रा... शब्दों का हिसाब कर ले
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