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जिस शाख़ पर कभी घर था, आज वही अनजान हो गया

                
                                                         
                            जिस शाख़ पर कभी हरियाली मुस्कुराती थी,
                                                                 
                            
आज वहाँ ख़ामोशी अपनी चादर बिछाती है।
कभी जो पत्ता धूप में सोना-सा चमकता था,
आज वही मिट्टी में अपनी कहानी लिखता है।

हवा आज भी उसी राह से गुज़रती है,
मगर अब कोई सरसराहट सुनाई नहीं देती।
शाख़ पर फिर नए पत्ते खिल उठे हैं,
पर पुराने पत्ते की कमी दिखाई नहीं देती।

वक़्त ने रंग छीने, ऋतु ने साथ छोड़ा,
सूखे पत्ते ने फिर भी कोई शिकायत न की।
जिस शाख़ को समझा था अपना,
उसी से बिछड़कर कोई बग़ावत न की।

अब हवा का एक झोंका आता है,
तो पत्ता चुपचाप थोड़ा काँप जाता है।
शायद सीने में कुछ यादें शेष हैं,
वरना सूखा पत्ता कहाँ यूँ हिल पाता है।

और देखो, कितना अजीब है प्रकृति का विधान,
जिस शाख़ पर कभी घर था, आज वही अनजान हो गया।
शाख़ पर फिर नए पत्ते मुस्कुराने लगें,
और पुराने मिट्टी में खोने लगे।

शायद पतझड़ का यही दस्तूर है,
कुछ पत्ते शाख़ों पर लौट नहीं पाते,
नई पत्तियाँ फिर हरियाली तो ले आती हैं,
मगर बीते मौसम फिर लौटकर नहीं आते। 🍂
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8 घंटे पहले

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