वह दौर कुछ और था,
जब तुम किसी कोने में बैठकर
उस एक तस्वीर को तरसते थे,
उसे देख-देख कर ही बस
अपने इस नादान मन को बहलाते थे।
वक्त बदला, समां बदला,
यह दौर कुछ और है आज,
पर न जाने उस शख्सियत में क्या बात थी,
कि उसकी याद आज भी वही है।
मैंने संभाल कर रखा है उसे,
बहुत ख्याल से, बहुत सलीके से।
उन प्यारी सी पुरानी यादों को
अब एक नए, दिलकश लिबास में सजा रहा हूँ।
पहले सोचता था...
क्या कह दूँ उनसे अपनी हताशा की बातें?
पर अब दिल को यह गँवारा नहीं।
अब मिलने का मन उस हताशा से ऊपर उठ चुका है,
अब मायूसी का कोई नामो-निशान नहीं।
देखो, यह दिल अब खिल उठा है,
जैसे सजोए हुए फूलों से
कोई सुंदर सा गुलदस्ता सज जाता है!
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X