सावन गया, वर्षा ऋतु भी,
पर वर्षा यहीं रह गई।
बेचैन दिन में ही स्नेहा को लेकर,
काया काँप रही।
हाथ-पाँव सभी पल भर में,
अपनी गति भूल गए।
रात के पहर से पहले ही,
सब घर में तैयार बैठे हैं।
जैसे कोई नई दुल्हन,
बच्चे-बूढ़े सभी तंग आकर बैठ गए।
ऋतु के बाद कौन सी रह गई बात?
यह इतना गरज रहा,
मानो बादल रो देगा आज!
चमकीले बादलों से (बिजली) निकल रही,
दुनिया परेशान है।
मुलायम फूल बेचारे,
घर में अपने खिले हैं।
संसार के एक वरिष्ठ अधिकारी उपस्थित हैं,
छतों के ऊपर ही बैठे।
कमरे में बंद खुद को,
गुलाम बना रहे वरिष्ठ!
कैसे कहूँ?
तितलियाँ कहीं गुम हो गई हैं,
वर्षा अभी भी यहीं है।
बेचैन मन कई बार कह रहा हमसे,
कह दूँ—
"टाटा, बाय-बाय, बाय-बाय,
अब वापस जाओ!
अगले वर्ष अपनी ऋतु के वक्त,
अपने समय से आना।"
वर्षा यहीं रह गई,
बेचैन दिन में ही स्नेहा को लेकर,
काया काँप रही।
- अभिषेक गुप्ता
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