रात नहीं कुछ गुज़र रहे तेरे बिना,
जैसे काटता रहा हूँ मैं तन्हाई का हर पल।
स्वाद की कोई चाय की चुस्की नहीं भाती,
बेचैनी सी बेतवा हुए जा रही है हर कल।
न जाने कहाँ, क्या तुमने सुना और मैंने कहा,
प्यार और वफ़ा के नाम हर दर्द को लिखा।
लाज रख इस वफ़ा के हर एक सितम की,
बता इस तन्हाई को अब कैसे सहन किया जाए।
इन रातों में न कोई मुस्कान बची है अब,
और न ही चैन से जिया जा रहा है अब।
तुम्हारे जाने के बाद से लेकर आज तक,
हर बार यूँ ही सितम में गिरा जा रहा हूँ मैं।
हाँ, वफ़ा की तेरी राहों में बार-बार,
यूँ ही टूटकर हर पल गिरा जा रहा हूँ मैं।
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