मुझे मोहब्बत हो गई है,
किसी जीव से नहीं,
बल्कि एक निर्जीव से।
जो कभी किसी जीव का अंश था
(लकड़ी और चमड़ा),
मैं उसी के रूप से प्यार करता हूँ।
अभिषेक,
ज़रा रुको!
कहीं मेरी आवाज़ की गूँज धीमी न पड़ जाए,
क्योंकि वह आवाज़ ही मेरी जान है।
जब भी यह ढोल,
यह साज़ बजता है,
उसकी हर थाप,
हर ताल पर तुम्हारा ही नाम लिखा है।
अब मैं क्या करूँ,
कृष्ण?
अभिषेक,
मैं प्यार कर बैठा हूँ—
इस ढोल से,
इस संगीत से,
और इसकी एक मधुर रीत से।
अभिषेक,
मेरी इस राह को आगे बढ़ाओ,
इसे तुम चाहो तो ,
मोहब्बत कहो ,
या इश्क़,
जो कहना है कहो,
बस मुझे मेरे इस प्रिय ,
ढोल से दूर मत करो!
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