ये चंद घड़ियाँ बादल है गर
बरस गए तो वापस नही आयेंगे
इन लम्हों को सँभाल कर रखो
ये पंछी है गर उड़ गए तो
बसेरा कहीं और लेंगे
अपने अच्छे दिनों को
अपनी जेब मे महफ़ूज़ रखो
गर कट गयी जेब तो ये
किसी और के हो जायेगे
-अभय ‘अवधी’
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