आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

अब ज़िंदगी को जीना सीखा हमने

                
                                                         
                            चंद रास्ते अभी भी न-मुकम्मल है
                                                                 
                            
न जाने कितने ख़्वाब भी अधूरे हैं
तस्वीरें हयात को बेशुमार रंग दिये
पर उसमें कुछ रंग अभी भी फीके हैं
जो भी बिछड़े हमसे जो भी छूटा हमसे
वो सब वाबसता हुआ यादों मे
जो बचा वही बसा लिया ख़यालों में
वक़्त की हर चोट और दर्द को झेला
पर कभी न रोना सीखा हमने
नाकारा साबित न हुए नाकामियों से
बस सफ़र जीने का जारी रखा हमने
कल की है किसको ख़बर अवधी
अब ज़िंदगी को जीना सीखा हमने
-अभय ‘अवधी’
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
एक दिन पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर