आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

ग़ज़ल

                
                                                         
                            ग़ज़ल
                                                                 
                            

चखता आखिर कब वो नफ़रत
उल्फ़त  की  जो  जाने  लज़्ज़त

छोड़ो    यारों   अब  वो  आदत
जिसके  कारण  बिगड़ी हालत

चीज़   हमेशा  मिल  जाती  वौ
दिल में  जिस की  होती चाहत

नफ़रत  की   जो  बोते  फसलें
वो  ही  सहते  जग में ज़िल्लत

जग   में  रहना  जो  इज़्ज़त से
करना    मत  बे वज्ह  बगावत

- हमीद कानपुरी
अब्दुल हमीद इदरीसी
मीरपुर कैण्ट कानपुर- 208004
- हम उम्मीद करते हैं कि यह पाठक की स्वरचित रचना है। अपनी रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
11 घंटे पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर