ग़ज़ल
चखता आखिर कब वो नफ़रत
उल्फ़त की जो जाने लज़्ज़त
छोड़ो यारों अब वो आदत
जिसके कारण बिगड़ी हालत
चीज़ हमेशा मिल जाती वौ
दिल में जिस की होती चाहत
नफ़रत की जो बोते फसलें
वो ही सहते जग में ज़िल्लत
जग में रहना जो इज़्ज़त से
करना मत बे वज्ह बगावत
- हमीद कानपुरी
अब्दुल हमीद इदरीसी
मीरपुर कैण्ट कानपुर- 208004
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