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आस का पंछी

                
                                                         
                            क्या लिखूं और क्या कहूं
                                                                 
                            
और अब मैं तुमसे प्रिये
कितनी नावों से कितनी बार
धारा को किया होगा पार
किनारे पर आ कर
किया होगा महसूस
ठहराव ज़िन्दगी का
जो प्रतीत होती है
कभी कभी बेजान सी
घास फूस
जो उड़ जाती है
एक ही फूंक में
और हो जाती है
अस्तित्व विहीन
ऐसी ही तो
शायद है ये ज़िन्दगी
जो जन्म लेती है
अन्धकार से
अपनी आँखे खोलती है
उजाले में
परन्तु आस पास का वातावरण
उस उजाले को फिर बना देता है
अन्धकार
जिसमे पलती फूलती है
ये ज़िन्दगी
और तरसती रहती है
उजाले को
जो जानती ही नहीं
नाम ख़ुशी का
मगर जब देखती है
उसे पास दूसरों के
तो एक अपरिचित सी
उससे मिलती है
जब करना चाहती है
उससे जान पहचान
तो फिर हो जाती है
किस्मत के हाथों लाचार
मगर इतना सब
होने के बाद भी
ये ज़िन्दगी जीती है
इक किरण की आस में
यदि मिले उसे
किरण का आभास भी
तो करती है
उसका स्वागत उत्साह से
शायद ऐसी ही है
ये ज़िन्दगी
जो जानती नहीं है हंसी को
मगर चाहती है
फिर भी हँसना
वो हर उस लम्हें का
करती है इंतज़ार
जिसमे वास है
उस हँसी का
छोटी से छोटी हंसी को
हँसती है खिलखिलाकर
शायद ऐसी ही तो है
ये ज़िन्दगी
या फिर है परतन्त्र सी
जो मजबूर है
अपने हालातों से
या फिर गुलाम है
दूसरों के विचारों से
शायद ऐसी ही है ये ज़िन्दगी
या फिर जीती है
स्वतन्त्रता की आस में
और स्वागत करती है
स्वतन्त्रता की खुशबू का
कि आओ तुम्हारा इंतज़ार है
शायद ऐसी ही है ज़िन्दगी
जिसे इंतज़ार है
वक्त का
इंतज़ार है स्वतन्त्रता का
इंतज़ार है भविष्य का
इंतज़ार है अपने कर्म का
इंतज़ार है एक आस का
इसिलिये ज़िन्दगी को
कहते है
आस का पंक्षी.........(वत्सु)

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9 वर्ष पहले

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