जाना है इस जहान से तो जी के जाइए!
दो चार घूॅंट ही सही पर पी के जाइए!!
जिस सम्त भी निकल पड़ें ख़ुशियाॅं बिखेर दें!
हरगिज़ कहीं न साथ उदासी के जाइए!!
सच बोलने की आप में हिम्मत नहीं अगर!
तो मारिए ज़मीर को लब सी के जाइए!!
ज़ालिम का ज़ुल्म मिट गया ख़ुशियाॅं मनाइए!
जलते हुए चराग़ ले के घी के जाइए!!
'परवेज़' बे-गुनाह अगर हैं तो सामने!
बे-ख़ौफ़ हो के आप इलाही के जाइए!!
- आलम-ए-ग़ज़ल परवेज़ अहमद
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