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उन्हें हम उन की गलियों से गुज़र के देखते हैं

                
                                                         
                            उन्हें हम उन की गलियों से गुज़र के देखते हैं!
                                                                 
                            
बहाने कर के हम उन को ठहर के देखते हैं!!

ज़माने से जो डरते हैं वो डर के देखते हैं!
उन्हें दिल थाम के हम आहें भर के देखते हैं!!

ज़मीं के लोग तो माना कि दीवाने हैं उन के!
फ़लक से चाॅंद तारे भी उतर के देखते हैं!!

फ़रिश्ते भी बहक जाऍं अजब जल्वा है उन का!
हम उन के हुस्न पे इल्ज़ाम धर के देखते हैं!!

हसीं लोगों से उन का रब्त रहता है ज़ियादा!
चलो फिर आज उन को बन-सॅंवर के देखते हैं!!

दिल-ए-बर्बाद लोगों से वो रखते हैं त'अल्लुक़!
चलो ख़ुद को ज़रा बर्बाद कर के देखते हैं!!

ग़ज़ल 'परवेज़' कहते हैं हमेशा ही बहर में!
करिश्मे सब के सब आओ बहर के देखते हैं!!

- आलम-ए-ग़ज़ल परवेज़ अहमद
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3 दिन पहले

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