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जहाँ सुनने वाला कोई न हो, वहाँ क्या कहा जाए।

                
                                                         
                            न रावण है कहानी में, न सीता ज़िंदगानी में,
                                                                 
                            
मगर बनवास फिर भी चल रहा है, क्या किया जाए।

न कोई वन है सामने, न कोई राह अनजानी,
मगर घर में भी लगता है, सफ़र सा है, क्या किया जाए।

जिन्हें अपना समझ बैठे, वही समझे नहीं हमें,
किसी से क्या शिकायत हो, सभी अपने हैं, क्या किया जाए।

बहुत कुछ कहने को है, मगर ख़ामोश रहना है,
जहाँ सुनने वाला कोई न हो, वहाँ क्या कहा जाए।

कभी हालात से हारे, कभी ख़ुद से ही लड़ते रहे,
ये दिल भी रोज़ मरता है, मगर ज़िंदा है, क्या किया जाए।

न मंज़िल की तलाश अब, न लौटने की तमन्ना है,
बस ये रास्ता ही कटता रहे… और क्या किया जाए।

 
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12 घंटे पहले

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