आईने में चेहरा देखा, तो एक बात समझ आई,
जिसे दुनिया ने खुश समझा, उसकी आँखों में तन्हाई।
लबों पर हँसी सजी थी, आँखों में थकान थी,
वो शख़्स जो सामने खड़ा था, ख़ुद से ही अनसान था।
उम्र भर दूसरों की ख़ातिर, खुद को बदलते रहे,
सबके दर्द समेटे हमने, अपने दर्द से बचते रहे।
किसी ने हाल पूछा तो, बस इतना कह दिया,
सब ठीक है यहाँ, और बात को वहीं छोड़ दिया।
कुछ ख़्वाब वक़्त ने तोड़े, कुछ हमने छोड़ दिए,
कुछ अपने ही थे ऐसे, जो हमें तन्हा छोड़ गए।
हम आईने से पूछते रहे, कमी कहाँ रह गई,
हर बार नज़र चेहरे पर थी, बात रुह तक जा गई।
फिर एक रोज़ ख़ामोशी में, खुद से सवाल किया,
सबको समझते-समझते, खुद को क्यों बेहाल किया?
उस रोज़ पहली बार, ख़ुद से नज़र मिलाई थी,
चेहरे पर नहीं, अपने भीतर की धूल हटाई थी।
अब दुनिया क्या समझेगी, ये सोचते नहीं हैं,
हम खुद की नज़रों में गिरकर, अब जीते नहीं हैं।
आईने के उस पार कोई अजनबी नहीं था,
वो मेरा ही वज़ूद था, जिसे मैंने कभी देखा नहीं था।
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