मेरी रचना का शीर्षक है-
बौखलाहट-
हार की बौखलाहट इस कदर बढ़ रही है
मासूम बच्चियां जो कत्लेआम हो रही हैं
कभी फतवा तो कहीं राजनीतिक अड़ंगा
खिसियानी बिल्ली जैसी नोचती है खंभा
कश्मीर, राजस्थान या रहा हो दरभंगा
है बेगुनाह बेटियों के अपराधियों से रंगा
हार की बौखलाहट को है कौन नही देखा
क्यों बंगाल में हो रही हत्या को नही देखा
कानून से समाज का विश्वास उठ चुका है
पैसे वालों के हाथ खुलेआम बिक चुका है
किसी को जमानत पर है, जमानत मिली
तो है किसी बेगुनाह को सजाए मौत मिली
आखिर क्यों नही बनता एक ठोस कानून
अपराधी भले से ही क्यों न हो अफलातून
हर किसी को कानून का निश्चित हो खौफ
हार की बौखलाहट का न कभी करें शोक
बच्चियों की आबरु को उठ खड़ा हो समाज
कानून अपराधियों को सजाए मौत दे आज
कवि- पं. अमरेश उपाध्याय
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