कहीं कुछ घट के रह गया,
ममता की डोर का टुकड़ा एक,
कट के रह गया ..
कुछ चटख लाल रंग से सनी दीवारों के बीच,
फंस के रह गया ....
वो जो मुस्करा के पलटा था,
मेरी आंखों के सामने,
गया था नये सपने गढ़ने,
दर्दनाक किस्सा एक ,
बन के रह गया ...
कहीं कुछ घट गया,
परिवार की मुस्कान का एक हिस्सा,
कट के रह गया...
किलकते विहान का वो एक क्षण,
बिलखता रह गया...
पशुता से भरा एक कर्म,
रोम-रोम में दरकता रह गया...
पिशाच ने खेली होली खून की
इक नन्ही सी कोंपल का निखार,
वासना का ग्रास बन के रह गया.
लिप्सा और कुत्सा में लिपटा मनुज,
कर उम्र को दरकिनार,
चाकू की धार, दनुज बन गया ...
आज पाशविकता सिर्फ देखती एक शरीर,
नहीं उम्र का कोई बंधन रह गया...
कहीं है सोयी "निर्भया", कहीं "प्रद्युमन",
जीवन क्या कुत्सित आनंद का सामान बन के रह गया .
कहीं कुछ घट के रह गया,
- अभिलाषा विनय
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