धूमिल की नज़र में कविता भाषा में आदमी होने की तमीज है

धूमिल
                
                                                             
                            ''न कोई छोटा, न कोई बड़ा 
                                                                     
                            

हर आदमी एक जोड़ी जूता''


मूलरूप से धूमिल किसानों और नौजवानों की यातना व संघर्ष को शब्द देने वाले साठोत्तरी कविता के कवियों में सबसे आगे हैं। उनकी नजर में कविता, भाषा में आदमी होने की तमीज है।



9 नवंबर 1936 को बनारस के खेवली गांव में सुदामा पांडेय ‘धूमिल’ का जन्म हुआ था। धूमिल नाम से वह जीवन भर कविताएं लिखते रहे। अल्पायु में ही ब्रेन ट्यूमर की वजह से 10 फरवरी 1975 को उनकी मृत्यु हो गई। आज कवि धूमिल की कविताएं अपने समय से कहीं ज्यादा प्रासंगिक हैं। ‘संसद से सड़क तक’ नामक कविता संग्रह, जो सन 1971 में प्रकाश में आया, में भय, भूख, अकाल, सत्तालोलुपता और अंतहीन भटकाव को रेखांकित करतीं, अाक्रामकता से भरपूर सभी कविताएं अपने आप में बेजोड़ हैं। आगे पढ़ें

1 year ago

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