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जनकवि बाबा नागार्जुन जिन्होंने इंदिरा गांधी ही नहीं, मायावती और बाल ठाकरे पर भी कविता से किया सवाल

Baba Nagarjun
                
                                                         
                            हिन्दी के जिन चार बड़े समकालीन कवियों की चर्चा अक्सर होती है उनमें त्रिलोचन, केदार नाथ अग्रवाल, शमशेर और नागार्जुन,शामिल हैं। दरअसल प्रगतिशील धारा के इन कवियों को एक ऐसे दौर का कवि माना जाता है जब देश राजनीतिक उथल-पुथल के साथ तमाम जन आंदोलनों के दौर से गुजर रहा था।
                                                                 
                            

सत्तर और अस्सी के दशक में वामपंथी धारा के साथ-साथ एक ऐसा साहित्यिक-सांस्कृतिक उभार था जो सत्ता और निरंकुशता के ख़िलाफ़ खड़ा हुआ था और जिसने कविता को छायावाद, सौंदर्यवाद और रूमानियत के दायरे से बाहर निकाल कर समाज और आम आदमी से जोड़ने की कारगर कोशिश की थी।

इस दौर के इन चारों समकालीन कवियों को साहित्य जगत में ये ऊंचाई मिली तो इसके पीछे उनके निजी जीवन और व्यक्तित्व का फक्कड़पन, सत्ता के निरंकुश चरित्र का विरोध, तानाशाही के ख़िलाफ़ एक रचनात्मक आंदोलन में उनकी अहम भूमिका और कविता के नए नए व्याकरण की तलाश जैसे पहलू शामिल हैं। इन्हीं चार बड़े कवियों में से आज याद करते हैं बाबा नागार्जुन को। 

इमरजेंसी के दौर में कैसे नागार्जुन एक जनकवि के रूप में स्थापित हुए, आंदोलनों में उनकी क्या भूमिका रही और कैसे उनके ख़ास अंदाज़ ने उन्हें एक अलग पहचान दी, इसके बारे में सबकी अपनी अपनी राय हो सकती है।

लेकिन नागार्जुन का अंदाज़ जिन लोगों ने देखा है, उन्हें क़रीब से समझा है, वो जानते हैं कि नागार्जुन अपने धुन और विचारों के पक्के थे, किस बात पर बिफर पड़ें और किसी सरकार, नेता या अफ़सर की परवाह किए बिना कैसे वो अपनी रचनाओं में, मंच पर या किसी भी जगह से अपनी बात कह जाएं, कोई नहीं जानता था। 

मुझे याद है 1974-75 के वे दिन जब बिहार में छात्रों का आंदोलन चरम पर था। जयप्रकाश नारायण छात्रों के मसीहा बन चुके थे और इंदिरा सरकार के ख़िलाफ़ पूरे देश में असंतोष फैल चुका था।

गुजरात से शुरू होकर बिहार पहुंचा छात्रों और युवाओं का आंदोलन, जेपी का संपूर्ण क्रांति का आह्वान, पटना के गांधी मैदान की 18 मार्च 1974 की वो ऐतिहासिक सभा और उस दौरान तमाम कवियों का नुक्कड़ों पर सत्ता विरोधी तेवर - ऐसा लगता था मानो जेपी ने हरेक के भीतर क्रांति का बीज बो दिया हो।
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2 वर्ष पहले

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