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आनंद बख़्शी के बेशक़ीमती गीतों का सरमाया लोगों की ज़बान पर है...

anand bakshi
                
                                                         
                            अपने अल्फ़ाज़ से झंकृत करने वाले मशहूर गीतकार आनंद बख़्शी फ़ौज में रहने के बावजूद शायर दिल फ़ौजी थे। आम तौर पर माना जाता है कि फ़ौजी थोड़े सख़्त मिज़ाज होते हैं और शेरो-शायरी में उनकी कोई ख़ास दिलचस्पी नहीं होती। लेकिन, बख़्शी ऐसे नहीं थे। वो नर्म दिल और शब्दों को तराशने वाले फ़नकार थे। 21 जुलाई 1930 को रावलपिंडी में पैदा हुए आनंद बख़्शी ने हालात से कभी समझौता नहीं किया। उन्होंने बंदूक में कलम को देखा और शेर-ओ-शायरी के फ़न को ज़िंदा रखा। 
                                                                 
                            

1983 में दूरदर्शन को दिए एक इंटरव्यू में आनंद बख़्शी बताते हैं, "मुझे बचपन से ही लिखने का शौक़ था, जब मैं फ़ौज में चला गया तो वहां भी थोड़ा बहुत लिखता था। वहां कुछ छोटे-मोटे स्टेज प्ले होते थे, मैं उनमें भी हिस्सा लेता था।

रात को हमारे फील्ड एरिये में दूर-दूर तक लाउडस्पीकर लगे होते थे। मैं उनके नीचे खड़ा हो जाता था, जब लाउडस्पीकर पर किसी गीतकार का गीत बजता था, तो बोलते थे अब सुनें फलां गीतकार की रचना। मेरे दिल में एक हूक सी उठती थी। क्या कभी ऐसा भी दिन आएगा कि किसी स्पीकर से मेरा नाम भी लिया जाएगा कि अब सुनिए आनंद बख़्शी की रचना।"  आगे पढ़ें

2 वर्ष पहले

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