बेच रही एक नार काँच की चूड़ियाँ
देख रही लालायित हो कर
कब आये कोई बहू बेटियां
हो अमर सुहाग अखंड रहे चूड़ियाँ
छिपा रही है वो अपनी मजबूरियाँ
बेच रही एक नार काँच की चूड़ियाँ
देखो आज है सुँदर सा अवसर
रहेगा तुम दोनों का प्रेम परस्पर
ले जाओगी जो आज चूड़ियाँ
कम हो जाएँगी प्रेमी से दूरियाँ
बैच रही एक नार काँच की चूड़ियाँ
पॉवडर लिपस्टिक तेल अत्र है
नेल पेंट और शीशा हुजूर हैं
सजा लो अपने नव यौवन को
निखार लो अपने रूप उज्ज्वल को
अलता पाँव सजाना सखी री
मेहँदी हाथ में लगाना प्यार की
गोंद भर जाएंगी तुम्हारी
ये ही दुआ है दिल से हमारी।
आस लगाये देखे इत ऊत
मिले कुछ दाम आज उच्च
बेच रही एक नार काँच की चुड़ियाँ
-संध्या चतुर्वेदी,
मथुरा
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