बेरूखी में अपनी इंसान क्यों मुझे भूल जाते हो तुम
यूंही बेकार समझकर सड़कों के किनारे फेंक जाते हो तुम
जब आता है मौसम सर्द हवा का तो यहां-वहां से उढ़ाकर
ले आते हो तुम...लगती है ठंडी तो मुझे जलाजाते हो तुम
क्यों अपनी बेरूखी में मुझे भूल जाते हो तुम
कहते है डूबते को तिनके का सहारा मिल जाये तो फना होने से बच जाते हैं लोग..फिर भी इस तरह का ईनाम दे जाते हैं लोग
प्यार के नगमें हों या खुशी के फसाने तो याद आते हम
फिर भी मैं बनकर फूलो की डाली बिखर जाता हूँ कदमो में तुम्हारे होकर जुदा फलक से अपने और
उन्ही कदमों में बेवजहा रोंद जाते हो तुम
तुम चाहे याद करो जरूरतों के लिये मुझे पर-मगर
तुम्हारी सलामती के लिये हर-पल दुआ मनाते हैं हम
फिर-भी बेरूखी में अपनी अ-इसां कयों मुझे भूल जाते हो तुम
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