आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

पेड़ बचाअो

save trees and save life...
                
                                                         
                            बेरूखी में अपनी इंसान क्यों मुझे भूल जाते हो तुम
                                                                 
                            
यूंही बेकार समझकर सड़कों के किनारे फेंक जाते हो तुम
जब आता है मौसम सर्द हवा का तो यहां-वहां से उढ़ाकर
ले आते हो तुम...लगती है ठंडी तो मुझे जलाजाते हो तुम
क्यों अपनी बेरूखी में मुझे भूल जाते हो तुम
कहते है डूबते को तिनके का सहारा मिल जाये तो फना होने से बच जाते हैं लोग..फिर भी इस तरह का ईनाम दे जाते हैं लोग
प्यार के नगमें हों या खुशी के फसाने तो याद आते हम
फिर भी मैं बनकर फूलो की डाली बिखर जाता हूँ कदमो में तुम्हारे होकर जुदा फलक से अपने और
उन्ही कदमों में बेवजहा रोंद जाते हो तुम
तुम चाहे याद करो जरूरतों के लिये मुझे पर-मगर
तुम्हारी सलामती के लिये हर-पल दुआ मनाते हैं हम

फिर-भी बेरूखी में अपनी अ-इसां कयों मुझे भूल जाते हो तुम

हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है। 

आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
8 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर