मेरी ज़िन्दगी का वो चार मिश्रा बन कर रह गई
जब भी उसकी याद आयी अश्क़ों में मिल कर बह गई
हम उसको याद करते रहे वो याद बन कर रह गई
जब भी तेरा दीदार हुआ मेरी सांस थम के रह गई
मेरी वफ़ा को तू भी बेवफा कह गई
कर के याद तुझे मेरी आंखें भीग जाती हैं
इतना कहते कहते वो थम गई
तुम खुशहाल हो सदा शुहागन रहो कह के आवाज मेरी दब गई
- हमें विश्वास है कि हमारे पाठक स्वरचित रचनाएं ही इस कॉलम के तहत प्रकाशित होने के लिए भेजते हैं। हमारे इस सम्मानित पाठक का भी दावा है कि यह रचना स्वरचित है।
आपकी रचनात्मकता को अमर उजाला काव्य देगा नया मुक़ाम, रचना भेजने के लिए यहां क्लिक करें।
कमेंट
कमेंट X