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आनंद बख़्शीः जिनके गीतों ने बख़्शी बॉलीवुड को मोहब्बत 

आनंद बख्शी
                
                                                         
                            'सोलह बरस की बाली उमर को सलाम,
                                                                 
                            
ऐ प्यार तेरी पहली नज़र को सलाम'


ये दो पंक्तियां काफ़ी हैं इश्क के मज़मून को पढ़ने के लिए। प्यार भरे नग़मों की बात चले, तो ज़हन मे ख़्याल सिर्फ़ एक ही शख़्स का आता है, जिसे क़लम का शिल्पकार कहें, तो अतिश्योक्ति न होगी। प्यार के अहसास को अल्फ़ाजों के सहारे हरदिल अज़ीज़ बनाने वाले आनंद बख्शी की मक़बूलियत आज भी बरक़रार है। शमशाद बेगम से लेकर शाहरुख़ ख़ान तक की मोहब्बत को बख़्शी साहब ने अपने लफ़्ज़ों से बख़्शा है। बॉलीवुड में लगभग चार दशक तक इश्क़ की बयार बहाने वाले आनंद बख़्शी साहब के लगभग 4000 नग़में आज भी फ़िज़ाओं में गूंज रहे हैं, जो किसी न किसी माध्यम से हमारे कानों से रूबरू हो जाते हैं और अहसास कराते हैं कि एक शख़्स था, जो प्रेम को अमर कर गया। दौर बदला, दिल बदले, दायरा बदला, लेकिन नहीं बदला तो बख़्शी साहब के लिखने का अंदाज़। वो जिस तरह से सरल शब्दों को पिरोते थे, इसने उन्हें आम आदमी का पसंदीदा गीतकार बना दिया। ब्लैक एंड व्हाइट फ़िल्म हो या रंगीन, पर्दे पर हर दौर के कलाकार बख़्शी साहब के गीत गुनगुनाते दिख जाते हैं। 

आनंद बख़्शी साहब के गीतों में हर तरह का प्यार झलकता है। चाहे ये प्यार महबूब के लिए हो या फिर वतन के लिए या फिर बात करें दोस्ती की। फ़िल्म शोले के ही गीत की बात करते हैं...

'ये दोस्ती हम नहीं तोड़ेंगे
तोड़ेंगे दम मगर तेरा साथ ना छोड़ेंगे
ऐ मेरी जीत तेरी जीत तेरी हार मेरी हार
सुन ऐ मेरे यार
तेरा ग़म मेरा ग़म तेरी जान मेरी जान
ऐसा अपना प्यार
खाना पीना साथ है, मरना जीना साथ है
सारी ज़िन्दगी
ये दोस्ती' ...


बख़्शी साहब ने यह गाना लिखकर दोस्ती को नायाब तोहफ़ा दिया है। जब कभी दोस्तों की महफ़िल सजती है, तो इस गीत का महफ़िल में शुमार होना लाज़मी हो जाता है। इस गाने में दोस्ती की शिद्दत को शब्दों में ढालकर पेश किया गया है और बताया गया है कि मोहब्बत दोस्ती का भी एक नाम है। यह तो हुई दोस्ती की दास्तां...जब वतन से मोहब्बत की बात आई, तो उन्होंने फिल्म कर्मा के मशहूर गीत को देशभक्ति से भरपूर गीतों की जमात में अव्वल सफ़ पर खड़ा कर दिया। 

'हर करम अपना करेंगे, ऐ वतन तेरे लिए
दिल दिया है जान भी देंगे ऐ वतन तेरे लिए'


इस गीत के हर लफ़्ज़ में देशप्रेम कूट-कूटकर भरा गया है। हर पंक्ति से वतन से मोहब्बत की खुशबू आती है। गीत के आग़ाज में ही इरादों से वाकिफ़ करा दिया गया है कि हम देश के लिए हर करम करेंगे। वक़्त पड़ा तो वतन की ख़ातिर जान भी दे सकते हैं। बताया जाता है जब इस गाने की चार पंक्तियां बख़्शी साहब ने फ़िल्म के निर्माता-निर्देशक सुभाष घई को सुनाईं, तो उन्होंने बेहद खुश होकर सौ रुपये का नोट निकालकर उन्हें थमा दिया। यह नोट बख़्शी साहब ने ताउम्र अपने पास संभालकर रखा। कहना का मतलब यह है कि बख़्शी साहब के गीतों के गुलदस्ते में मोहब्बत की हर क़िस्म का फूल मौजूद है और जब-जब फूल खिलेंगे, बख़्शी के अल्फ़ाज़ों की ख़ुशबू महकाते रहेंगे।  आगे पढ़ें

आनंद बख़्शी का जन्म 21 जुलाई 1930 को रावलपिण्डी में हुआ था

9 वर्ष पहले

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