इसी लिए तो यहाँ अब भी अजनबी हूँ मैं
तमाम लोग फ़रिश्ते हैं आदमी हूँ मैं
- बशीर बद्र
प्यार की चाँदनी में खिलते हैं
दश्त-ए-इंसानियत के फूल हैं हम
- मसूद मैकश मुरादाबादी
आदमी के पास सब कुछ है मगर
एक तन्हा आदमिय्यत ही नहीं
- जिगर मुरादाबादी
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