इसी लिए तो यहाँ अब भी अजनबी हूँ मैं
तमाम लोग फ़रिश्ते हैं आदमी हूँ मैं
- बशीर बद्र
प्यार की चाँदनी में खिलते हैं
दश्त-ए-इंसानियत के फूल हैं हम
- मसूद मैकश मुरादाबादी
आदमी के पास सब कुछ है मगर
एक तन्हा आदमिय्यत ही नहीं
- जिगर मुरादाबादी
उस के दुश्मन हैं बहुत आदमी अच्छा होगा
वो भी मेरी ही तरह शहर में तन्हा होगा
- निदा फ़ाज़ली
रखते हैं जो औरों के लिए प्यार का जज्बा
वो लोग कभी टूट कर बिखरा नहीं करते
- अज्ञात
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