तेग इलाहाबादी जिनका असली नाम मुस्तफ़ा ज़ैदी था। इलाहाबाद विश्वविद्यालय में पढ़ने वाले तेग विभाजन से पहले तक यही रहे और विभाजन के बाद पाकिस्तान चले गए। कराची में बैठकर शायरी करने वाले 'तेग' अपने नाम के आगे 'इलाहाबादी' होने की स्मृति को कभी नहीं दफ़न कर पाये।
उनकी शायरी में उनकी स्मृतियों का ये दर्द महसूस किया जा सकता है।
आगे पेश है उनके चुनिंदा शेर----
इश्क़ इन ज़ालिमों की दुनिया में
कितनी मज़लूम ज़ात है ऐ दिल
इस तरह होश गँवाना भी कोई बात नहीं
और यूँ होश से रहने में भी नादानी है
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इश्क़ इन ज़ालिमों की दुनिया में
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