शरद पूर्णिमा की चांदनी की शीतलता में शायरों का इश्क़ परवान चढ़ता है। चाँद शायरों की डायरी का वो पन्ना है जिस पर महबूबा की शक्ल-ओ-सीरत से लेकर रात की तन्हाई तक के किस्से लिखे जाते हैं। यह लेख़कों का वो पसंदीद बिम्ब है जिसकी प्रेरणा से उनकी कितनी ही नज़्में-ग़ज़लें सम्पूर्ण हो पाती हैं।
चाँद ख़ामोश जा रहा था कहीं
हम ने भी उस से कोई बात न की
- महमूद अयाज़
पूछना चाँद का पता 'आज़र'
जब अकेले में रात मिल जाए
- बलवान सिंह आज़र
चाँद को तुम आवाज़ तो दे लो
एक मुसाफ़िर तन्हा तो है
- अज़ीम क़ुरैशी
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....छत पर जा रहा है चाँद
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