सावन महिलाओं के लिए बहुत खास होता है। तपती हुई प्रकृति और जीवन दोनों को शीतल बना देने की क्षमता इसी मास में होती है। महिलाओं को बारिश की तरह ही परदेस कमाने गए प्रियतम का बेसब्री से इंतजार होता है। ग्रीष्म के बाद वर्षा ऋतु के आगमन पर प्रियतम के पास न होने का विरह सावन का संगीत है। आनंद, उमंग लेकर आता है सावन। चारों तरफ हरियाली छा जाती है। बादलों की उमड़-घुमड़, मोर-पपीहे के शोर से पता चलता है कि खग-विहग के लिए भी सावन सुहावना होता है। स्त्रियों के ससुराल से नैहर तक झूले पड़ जाते हैं और हर दिल में खुशियां छा जाती हैं...।
बादलों की उमड़-घुमड़, बिजली की चमक, सावन की रिमझिम फुहारें हर विरहिणी को सताती हैं। अकेलापन उससे सहा नहीं जाता। सूनी सेज उसे काटने दौड़ती है। ऐसे भाव सावन के लोकगीतों में सहज ही मिलते हैं। यह कहना है बनारस घराने की गायिका रीता देब का। वह राग पीलू में बड़े रामदास की कजरी के भावों से इसका एहसास कराती हैं।
सजनी छाई घटा घनघोर हमरे संवरिया नहिं आए....
बादर गरजे बिजुरी चमके तड़पत है जिया मोर...।
वे कहती हैं कि चारों तरफ घटा छा जाती है। बारिश की तरह पिया का भी उसे इंतजार रहता है। उमंग उठती है तो कहती कि हमसे रहा नहीं जा रहा है। दादुर, मोर, पपीहा, कोयल शोर मचा रहे हैं। आप ही नहीं है... आप कब आओगे...।
रीता इसी राग में दूसरी बंदिश का उदाहरण देती हैं-
सावन लागो सुहाई हो पियरवा...
मन सेज घेरि घटा नभ छाई हो पियरवा...
रस बरसत झर लाई हो पियरवा..
पीहू पीहू कोकिल मोर पुकारत,
सुनि सुनि जिया तरसाई हो पियरवा...।
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