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सरोकार की आवाजें जब कमजोर होती हैं तो 'विद्रोही' की कविताएं भीड़ की तरह बोलती हैं...

काव्य चर्चा

सरोकार की आवाजें जब कमजोर होती हैं तो 'विद्रोही' की कविताएं भीड़ की तरह बोलती हैं...

अमर उजाला, काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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रमाशंकर यादव 'विद्रोही' विद्रोही, इंसान के रूप में एक बिम्ब की तरह थे। सबको समझने का अलग-अलग मायने देते हुए, जीवन और लिबास में जर्जर, और एक मजबूत जनकवि उसके भीतर। लिबास से आदमी की पहचान करने वालों के लिए पूर्ण विराम लगाते हुए। इंसान की पहचान का कोई और मायने बताते हुए। वे इंसान को समझने और उसे भीतर से कहीं तलाशने का तौर देते थे। प्रस्तुत है उनकी कविता- औरतें...

कुछ औरतों ने अपनी इच्छा से कूदकर जान दी थी
ऐसा पुलिस के रिकॉर्ड में दर्ज है
और कुछ औरतें अपनी इच्छा से चिता में जलकर मरी थीं
ऐसा धर्म की किताबों में लिखा हुआ है

मैं कवि हूँ, कर्त्ता हूँ
क्या जल्दी है

मैं एक दिन पुलिस और पुरोहित दोनों को एक साथ
औरतों की अदालत में तलब करूँगा
और बीच की सारी अदालतों को मंसूख कर दूँगा
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