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पथरीलीं राहें...हिम्मत देता कविताओं का यह गुलशन   

जीवन संघर्ष
                
                                                         
                            साहित्य हमेशा प्रेरणा देने वाला होता है। मन में स्फूर्ति और ताजगी भर दे वही सर्वोत्तम साहित्य होता है। अवसाद में मनस्वी कवियों की बेहतरीन ओजस्वी कविताएं मनुष्य के मन को झकझोर कर जगाते रहती हैं। काव्य चर्चा में हम पांच ऐसी कविताएं आपके लिए पेश कर रहे हैं जिन्हें पढ़कर आपको जीवन पथ में मुश्किल के पलों में असीम साहस मिल सकेगा।सोहनलाल द्विवेदी सरल शब्दों में काव्य का ऐसा अनूठा रस साहित्य जगत को दिया है जो बरसों याद रहेगा। उन्होंने सकारात्मक जीवन को सबसे बड़ा लक्ष्य माना है। वह कहते हैं-
                                                                 
                            

लहरों से डरकर नौका पार नहीं होती
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

 नन्ही चीटी जब दाना लेकर चलती है
चढ़ती दीवारों पर, सौ बार फिसलती है
मन का विश्वास रगों मे साहस भरता है
चढ़कर गिरना, गिरकर चढ़ना न अखरता है
आखिर उसकी मेहनत बेकार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

डुबकियां सिन्धु मे गोताखोर लगाता है,
जा जा कर खाली हाथ लौटकर आता है
मिलते नहीं सहज ही मोती गहरे पानी में,
बढ़ता दुगना उत्साह इसी हैरानी में
मुट्ठी उसकी खाली हर बार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

असफलता एक चुनौती है, इसे स्वीकार करो,
क्या कमी रह गई, देखो और सुधार करो

जब तक ना सफल हो, नींद चैन को त्यागो तुम,
संघर्ष का मैदान छोड़कर मत भागो तुम
कुछ किए बिना ही जय जयकार नहीं होती,
कोशिश करने वालों की हार नहीं होती

—सोहनलाल द्विवेदी
हमारे इस सेक्शन में साहस पुंज के रूप में दूसरे कवि हैं महान दुष्यंत कुमार, जिन्होंने हिंदी साहित्य में गजलों को बड़ी बारीकी से अपने अलफाज में पिरोया है। दुष्यंत ओजस्वी कवियों में भी शुमार किए जाते हैं। उनकी शब्द रचना भावों में प्राणों का महीन और विस्तृत संचार करती है। उनकी यह कविता जीवन को अवसाद के क्षणों से निकालकर आशाओं से भर देती है।   

ये जो शहतीर है पलकों पे उठा लो यारो
अब कोई ऐसा तरीका भी निकालो यारो 

दर्दे-दिल वक़्त पे पैग़ाम भी पहुंचाएगा
इस क़बूतर को ज़रा प्यार से पालो यारो 

लोग हाथों में लिए बैठे हैं अपने पिंजरे
आज सैयाद को महफ़िल में बुला लो यारो 

आज सीवन को उधेड़ो तो ज़रा देखेंगे
आज संदूक से वो ख़त तो निकालो यारो 

रहनुमाओं की अदाओं पे फ़िदा है दुनिया
इस बहकती हुई दुनिया को संभालो यारो 

कैसे आकाश में सुराख़ हो नहीं सकता
एक पत्थर तो तबीयत से उछालो यारो 

लोग कहते थे कि ये बात नहीं कहने की
तुमने कह दी है तो कहने की सज़ा लो यारो

-दुष्यंत कुमार  आगे पढ़ें

पांडवों को जो कष्ट मिला उसको रामधारी सिंह दिनकर ने अपने काव्य रश्मिरथी और कुरूक्षेत्र में बखूबी पेश किया है

6 वर्ष पहले

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