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महाकवि भूषण के शब्दों में छत्रपति शिवाजी का शौर्य-वर्णन 'दावा द्रुम दंड पर, चीता मृगझुंड पर'

साहित्य
                
                                                         
                            इन दिनों भारत में चीते का ज़िक्र है। 74 साल बाद देश में चीते आए जिन्हें नामीबिया से लाकर मध्य-प्रदेश के कूनो नेशनल पार्क में छोड़ा गया था। यूं तो किसी महापुरुष के भीतर के बल को भी चीते की उपमा दी जाती है। फिर इस देश की धरती ने ऐसे कई महापुरुषों को जन्म दिया जिनके भीतर शेर का साहस था, चीते की तेज़ी थी और बाज़ की नज़र। जिन्होंने अपने शौर्य और पराक्रम के बल पर भारत का परचम लहराया। उन्हीं में एक नाम हैं शिवाजी महाराज। कवि भूषण की इस कविता से उनके पूरे व्यक्तित्व की कल्पना की जा सकती है। 
                                                                 
                            

भूषण वैसे तो रीति काल के कवि थे लेकिन उस दौर में उनकी कलम वीर रस से सराबोर थी। माना जाता है कि भूषण कई राजाओं के यहां रहे और वहां सम्मान प्राप्त किया। पन्ना के महाराज छत्रसाल के यहाँ इनका बड़ा मान हुआ।  भूषण ने प्रमुख रूप से शिवाजी और छत्रसाल की प्रशंसा में ही लिखा है। अब ज़रा भूषण के युद्ध वर्णन में छंद का ध्वन्यात्मक सौंदर्य और अलंकारों का सजीव चित्रण देखिए –

साजि चतुरंग वीर रंग में तुरंग चढ़ि,
सरजा सिवाजी जंग जीतन चलत हैं 
‘भूषण’ भनत नाद विहद नगारन के,
नदी नद मद गैबरन के रलत है ।।


भावार्थ:-  घोड़े पर सवार छत्रपति शिवा जी वीरता और कौशल से परिपूर्ण अपनी चतुरंगिणी सेना की अगुआई करते हुए जंग जीतने के लिए निकल पड़े हैं। बजते हुए नगाड़ों की आवाज़ और मतवाले हाथियों के मद से सभी नदी-नाले भर गए हैं। आगे पढ़ें

2 वर्ष पहले

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