आप अपनी कविता सिर्फ अमर उजाला एप के माध्यम से ही भेज सकते हैं

बेहतर अनुभव के लिए एप का उपयोग करें

विज्ञापन

परवीन शाकिर : तेरी चाहत के भीगे जंगलों में, मेरा तन मोर बन कर नाचता है

परवीन शाकिर
                
                                                         
                            नारी-मन की व्यथा को अपनी मर्मस्पर्शी शैली के माध्यम से अभिव्यक्त करने वाली पाकिस्तानी शायरा परवीन शाकिर उर्दू-काव्य की अमूल्य निधि हैं। सरस्वती की इस बेटी को भारतीय काव्य-प्रेमियों ने सर-आँखों पर बिठाया। उनकी शायरी में भारतीय परिवेश और संस्कृति की खुशबू को महसूस किया जा सकता है।
                                                                 
                            

आज तो उस पे ठहरती ही न थी आंख ज़रा 
उसके जाते ही नज़र मैंने उतारी उसकी 

तेरे सिवा भी कई रंग ख़ुशनज़र थे मगर 
जो तुझको देख चुका हो वो और क्या देखे 

मेरे बदन को नमी खा गई अश्कों की 
भरी बहार में जैसे मकान ढहता है 

सर छुपाएँ तो बदन खुलता है 
ज़ीस्त मुफ़लिस की रिदा हो जैसे 

तोहमत लगा के माँ पे जो दुश्मन से दाद ले 
ऐसे सुख़नफ़रोश को मर जाना चाहिये 

  आगे पढ़ें

परवीन की शायरी, खुशबू के सफ़र की शायरी है

8 वर्ष पहले

कमेंट

कमेंट X

😊अति सुंदर 😎बहुत खूब 👌अति उत्तम भाव 👍बहुत बढ़िया.. 🤩लाजवाब 🤩बेहतरीन 🙌क्या खूब कहा 😔बहुत मार्मिक 😀वाह! वाह! क्या बात है! 🤗शानदार 👌गजब 🙏छा गये आप 👏तालियां ✌शाबाश 😍जबरदस्त
विज्ञापन
X
बेहतर अनुभव के लिए
4.3
ब्राउज़र में ही

अब मिलेगी लेटेस्ट, ट्रेंडिंग और ब्रेकिंग न्यूज
आपके व्हाट्सएप पर