एक तख़्ती अम्न के पैग़ाम की
टांग दीजे ऊंचे मीनारों के बीच
- अज़ीज़ नबील
पैग़ाम ज़िंदगी ने दिया मौत का मुझे
मरने के इंतिज़ार में जीना पड़ा मुझे
- सफ़ी लखनवी
रात दिन नामा-ओ-पैग़ाम कहां तक दोगे
साफ़ कह दीजिए मिलना हमें मंज़ूर नहीं
- हसरत मोहानी
कहा क्या जाने क्या पैग़ाम-बर से
बहुत ख़ुश आज आता है उधर से
- लाला माधव राम जौहर
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