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साँझ की झिलमिली गिरती है तुम्हारी आँखों में : पाब्लो नेरूदा

पाब्लो नेरूदा
                
                                                         
                            12 जुलाई 1904 को जन्मे पाब्लो नेरूदा की कविताएं न सिर्फ चिली की बल्कि साम्राज्‍यवाद के विरुद्ध संघर्षरत पूरी लातिन अमेरिकी जनता की अमूल्‍य विरासत हैं।  नेरूदा को विश्व साहित्य के शिखर पर विराजमान करने में सिर्फ उनकी कविताओं का ही नहीं बल्कि उनके बहुआयामी व्यक्तित्व का भी योगदान था। हिंदी के सुप्रसिद्ध कवि अशोक वाजपेयी कहते हैं- उनकी कविताओं में प्रेम और क्रांति का अद्भुत समन्वय है, उन्होंने दोनों विरोधाभासी माने जाने वाली चीज़ों को संगुफित करके नया काव्यशास्त्र रचा। 
                                                                 
                            

अहा! चीड़ों का विस्तार, सरसराहट टूटती लहरों की,
रोशनियों का धीमा खेल, अकेली घण्टी
साँझ की झिलमिली गिरती है तुम्हारी आँखों में, गुड़िया,
और भूपटल पर जिसमें यह धरती गाती है !
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8 वर्ष पहले

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