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Manzoor shayari

काव्य चर्चा

क़ुबूलियत और नामंज़ूरी पर कहे शायरों के अल्फ़ाज़

अमर उजाला काव्य डेस्क, नई दिल्ली

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मुहब्बत में कोई अपने लाख इस्तीफ़े देना चाहे लेकिन दिल उसको हमेशा नामंज़ूर ही करना चाहता है। तो कई बार आपका प्रेमी चाहे मुहब्बत दे या नफ़रत आप उसे सहज ही क़ुबूल भी कर लेते हो। इसी पर शायरों ने अपने अल्फ़ाज़ लिखे हैं।

है ख़ुशी अपनी वही जो कुछ ख़ुशी है आप की
है वही मंज़ूर जो कुछ आप को मंज़ूर हो
- मिर्ज़ा मासिता बेग मुंतही


तुझ को मंज़ूर नहीं मुझ को है अब भी मंज़ूर
मेरी क़ुर्बत मेरे बोसे मुझे वापस कर दे
- फ़े सीन एजाज़

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