त्रिपुरा में लेनिन की मूर्ति तोड़ देने की ख़बर है। रूसी क्रांति के जनक लेनिन को शहीदे आजम भगत सिंह अपने जीवन के आख़िरी वक्त में याद कर रहे थे और उनका साहित्य पढ़ रहे थे। त्रिपुरा में हिंसा की खबर भी है। ऐसी घटनाओं के बीच हम अपने पाठकों के लिए जर्मन कवि बर्तोल्त ब्रेख्त की यह कविता पेश कर रहे हैं।
पहली जंग के दौरान
इटली की सानकार्लोर जेल की एक अन्धी कोठरी में
ठूँस दिया गया एक मुक्तियोद्धा को भी
शराबियों, चोरों और उचक्कों के साथ ।
ख़ाली वक़्त में वह दीवार पर पेंसिल घिसता रहा
लिखता रहा हर्फ़-ब-हर्फ़—
लेनिन ज़िन्दाबाद !
ऊपरी हिस्से में दीवार के
अँधेरा होने की वज़ह से
नामुमकिन था कुछ भी देख पाना
तब भी चमक रहे थे वे अक्षर— बड़े-बड़े और सुडौल।
जेल के अफ़सरान ने देखा
तो फ़ौरन एक पुताईवाले को बुलवा
बाल्टी-भर क़लई से पुतवा दी वह ख़तरनाक इबारत ।
मगर सफ़ेदी चूँकि अक्षरों के ऊपर ही पोती गई थी
इस बार दीवार पर चमक उठे सफ़ेद अक्षर :
लेनिन ज़िन्दाबाद !
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त्रिपुरा में लेनिन की मूर्ति का टूटना और बर्तोल्त ब्रेख्त की यह कविता...
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